“न उम्र की सीमा, न रज़ामंदी की ज़रूरत — तालिबान का काला फरमान”

अफगानिस्तान में तालिबान सरकार ने एक नया पारिवारिक कानून लागू किया है जिसका नाम है | “पति-पत्नी के बीच अलगाव के सिद्धांत”। इस 31 अनुच्छेद वाले फरमान में बच्चों की शादी को कानूनी मान्यता दे दी गई है। (सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अगर कोई कुंवारी लड़की चुप रहे, तो उसकी चुप्पी को शादी की मंजूरी) माना जाएगा। यानी “ना” कहने का हक भी नहीं, और “हाँ” कहना भी ज़रूरी नहीं।

यह फरमान (मई 2026 के मध्य) में तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा ने मंजूर किया और अफगानिस्तान के (आधिकारिक राजपत्र) में प्रकाशित किया गया। तालिबान के 2021 में सत्ता में वापस आने के करीब पाँच साल बाद यह सबसे विवादित कानून सामने आया है। यह कानून (अफगानिस्तान) में लागू किया गया है। इसे तालिबान के (न्याय मंत्रालय) ने प्रकाशित किया। इसका असर पूरे देश में होगा — खासकर उन दूरदराज के गाँवों में जहाँ गरीबी के चलते बच्चियों की शादी पहले से ही एक गंभीर समस्या रही है।

इस फरमान को तालिबान के सर्वोच्च नेता (हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा) ने मंजूरी दी। गौरतलब है कि अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) ने 8 जुलाई 2025 को अखुंदज़ादा और तालिबान के मुख्य न्यायाधीश (अब्दुल हकीम हक्कानी) के खिलाफ ‘मानवता के विरुद्ध अपराध’ — यानी महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ लैंगिक उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तारी वारंट जारी किए थे। तालिबान का दावा है कि यह कानून (इस्लामी शरिया की उनकी व्याख्या) के अनुसार बनाया गया है। लेकिन मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि असली वजह कुछ और है — तालिबान व्यवस्थित रूप से महिलाओं और लड़कियों को हर अधिकार से वंचित कर रहा है। लड़कियों की पढ़ाई पर रोक, नौकरी पर पाबंदी और अब यह कानून — सब एक ही सोच का हिस्सा है|

बाप या दादा किसी भी उम्र में बच्ची की शादी तय कर सकते हैं | लड़की की (चुप्पी को हाँ) माना जाएगा, लेकिन लड़के या शादीशुदा औरत की चुप्पी को नहीं | बचपन में हुई शादी को रद्द करवाना हो तो (तालिबानी अदालत की इजाज़त) लेनी होगी | तालिबानी जज अब (व्यभिचार, धर्म परिवर्तन और पति की गैरहाजिरी) जैसे मामलों में सीधे दखल दे सकते हैं और धार्मिक सज़ा भी सुना सकते हैं

संयुक्त राष्ट्र ने तालिबान की इन पाबंदियों की बार-बार निंदा की है और इन्हें (बुनियादी अधिकारों का व्यवस्थित उल्लंघन) बताया है। मानवाधिकार विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि तालिबान धीरे-धीरे इस्लामी कानून की कट्टर व्याख्याओं को राज्य के कानूनों में बदल रहा है — यानी लैंगिक भेदभाव अब सड़क पर नहीं, बल्कि सरकारी कागज़ों में दर्ज हो रहा है।

(100 से अधिक मानवाधिकार और महिला अधिकार संगठनों) ने एक संयुक्त बयान जारी कर इस कानून को “तत्काल, बिना शर्त और पूरी तरह रद्द” करने की माँग की। उन्होंने कहा कि यह कानून लड़कियों और महिलाओं को उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित करता है और बचपन में तय की गई शादियों को कानूनी मान्यता देता है। इन संगठनों ने (UN Human Rights Council, UNICEF, UN Special Rapporteur) और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से “तत्काल, व्यावहारिक और कड़े कदम” उठाने की अपील की — ताकि अफगानिस्तान की महिलाओं और बच्चों की जान, सुरक्षा और भविष्य बचाया जा सके।

अफगानिस्तान में बेहद गरीब परिवार अपनी नवजात बच्चियों की भी शादी तय कर देते हैं। परिवार कर्ज़ चुकाने या रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करने के लिए बच्चियों को “बेचते” हैं। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार एक “बाल दुल्हन” के लिए (500 से 3,000 डॉलर) तक वसूले जाते हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि अफगानिस्तान में (हर 3 में से 1 लड़की की शादी 18 साल से पहले) हो जाती है। फहीमा महोमेद ने सीधे कहा कि (बाल विवाह में असली सहमति हो ही नहीं सकती।) उन्होंने चेतावनी दी कि चुप्पी को मंजूरी मानना लड़कियों की आवाज़ और उनकी अपनी ज़िंदगी चुनने की आज़ादी को पूरी तरह छीन लेना है।

एक शोध रिपोर्ट बताती है कि 2021 से पहले अफगानिस्तान में यह सोच धीरे-धीरे बदल रही थी कि लड़कियों की शादी 18 साल के बाद होनी चाहिए — खासकर पढ़ी-लिखी युवा महिलाओं में। लेकिन तालिबान के आने के बाद पढ़ाई और नौकरी के दरवाज़े बंद होते ही यह बदलाव उलट गया। परिवार अब लड़कियों को (तालिबान नेताओं से ज़बरदस्ती निकाह) के डर से भी जल्दी ब्याह दे रहे हैं। अफगान महिलाएं अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इस दमन का विरोध करती रहती हैं। वे दुनिया को चेतावनी दे रही हैं कि अगर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने तालिबान की इस सोच को “सामान्य” मान लिया, तो आने वाली पीढ़ियाँ और भी गहरे अंधेरे में धकेल दी जाएंगी।

इस कानून का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि (लड़के की चुप्पी या शादीशुदा औरत की चुप्पी) को कभी सहमति नहीं माना जाएगा — यह कानून में साफ लिखा है। सिर्फ (कुंवारी लड़की की चुप्पी) को हाँ माना जाएगा। आलोचकों का कहना है कि यह एक कानूनी दोहरा मापदंड है जो जानबूझकर लड़कियों को कमज़ोर बनाने के लिए बनाया गया है। अफगान महिलाएं और मानवाधिकार कार्यकर्ता अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से एक ही बात माँग रही हैं — (तालिबान शासन को मान्यता मत दो।) उनका कहना है कि यह सिर्फ अफगानिस्तान का मुद्दा नहीं, यह पूरी दुनिया की महिलाओं के अधिकारों पर हमला है।

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